जो भी दरबार में आया वो अब तुम्हारा है।

।। श्री हरि:।।

तर्जः- जो भी दरबार में आया वो अब तुम्हारा है।

दर्दे दिल की दवा लेने आए हैं तुमसे,
पकड़ो कसके नब्ज देखो क्या क्या रोग हुआ
सुना है वैद्य बड़े हो तीनों तापों के…….
हो दर्दे दिल की…..

1. आदि दैविक, आदि भौतिक, अध्यात्म रोग है क्या
कोई भी दवा असर न करती कैसा रोग हुआ
सुना है सत चित आनंद के दाता हो तुम
हो दर्दे दिल की…….

2. कहते हैं हाथ सर पे तुम जो रख देते
मर्ज दिल क्या बीमारी जन्मों जन्म की मिटती
दिव्य आनंद की छटा बहा देते हो
हो दर्दे दिल की……..

3. प्रेम से एक बार छु लो न तसल्ली से
मुरझाई कलि खिल जाए जख्मी दिल की प्रभु
धड़कन मचलने लग जाए खुशी से मेरी
हो दर्दे दिल की…….

4. एक बार तान रसीली सुना दे मुरली की
पोर पोर में उमंग छा जाए मस्ती की
“धीरज” प्रेम भर दे दिल में तेरा प्रभु
हो दर्दे दिल की………

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