।। श्री हरि: ।।

तर्जः- कौन सुनेगा किस को सुनाए…………

स्थायी –

तेरे रहते गम क्यों सताए
दर्द किसे हम दिखाएं…..श्याम……….
दर्द किसे हम दिखाएं।
रस के सागर रससिन्धु हो
निरसता क्यों सताए…. श्याम………
निरसता क्यों सताए….।

तेरे रहते हार रहा मैं ये कैसे अब होने लगा
गम के बादल छांट दे मेरे दिल मेरा अब रोने लगा।
अब तो उठा ले मोरछड़ी को झाड़ा तेरा लगा जाए रस के सागर रससिन्धु हो………1.

दीनानाथ दया के सागर दीनों की आस हो तुम
और किसी से क्यों हम बोले करुणा की जब खान हो तुम।
लीले चढ़कर दौड़ा आजा दिल के तार झन झना जा
रस के सागर रससिन्धु हो…………..2

जब जब प्रेमी आँख के आँसु तुझ को भेंट चढ़ाता है
इत्र जैसे महके जीवन बगिया को सजाता है।
अपने बाग का फूल बना ले श्याम बनो तुम माली
रस के सागर रससिन्धु हो………….3.

“धीरज” श्याम प्रेम से भरदे दिल की मेरी गागरिया
छलके प्रेम सुधा रस जग में प्रेमीजनों की करूं सेवा
श्याम कृपा से श्याम के प्रेमी मोज रोज उड़ाए
रस के सागर रससिन्धु हो………….4.

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